शरीर पर गहरे चोट के निशान लिए घायल अवस्था में मिले 2 कंगारू, ऑस्ट्रेलिया से 7000 KM दूर कैसे पहुंचे भारत बना पहेली,

दोस्तों जैसा कि सभी को मालूम है इस धरती पर बहुत से जीव जन्तु है .जो वैसे तो घने जंगलो में रहते है लेकिन अब ज्यादातर जंगलो को काट दिया गया है जिस कारण भोजन की तलाश में ये जानवर शहरों तक पहुँच जाते है .लेकिन खबर मिली है कि शुक्रवार रात को गश्त के दौरान जलपाईगुड़ी के गजोल्डोबा के पास पश्चिम बंगाल के वन अधिकारियों को घायल अवस्था में दो कंगारू मिले है . आपको बता दे वैसे कंगारू ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते है ऐसे में उनका मिलना बहुत बड़ा रहस्य बना हुआ है .बेलाकोबा वन क्षेत्र के रेंजर संजय दत्ता ने कहना है कि गश्त के दौरान ये कंगारू रेस्क्यू किये गये हैं.

कंगारूओं के शरीर पर चोट के निशान

अधिकारियों को दोनों कंगारुओं के शरीर पर कुछ गंभीर चोटें मिलीं, जिसके बाद उन्हें आगे के इलाज के लिए तुरंत बंगाल सफारी पार्क लाया गया। आरओ ने बताया कि विशेष अधिकारियों की टीम ने मामले की जांच शुरू कर दी है

वन विभाग तलाश रहा सवालों के जवाब

फॉरेस्ट रेंजर एस दत्ता ने कहा कि हमने इन कंगारुओं के ठिकाने का पता लगाने के लिए आगे की जांच शुरू की है, उन्हें कौन और कैसे जंगल में लेकर आया। उन्हें यहां लाने के पीछे क्या कारण था, इसके जवाब तलाशे जाएंगे।

मार्च में भी मिले थे दो कंगारू

पश्चिम बंगाल पुलिस ने मार्च में कंगारू को अवैध रूप से ले जाने के आरोप में हैदराबाद के दो लोगों को गिरफ्तार किया था। कंगारू भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 7,000 किलोमीटर की यात्रा कर मिजोरम कैसे पहुंचा यह अब भी एक पहेली है।

भारत में नहीं पाए जाते हैं कंगारू

कंगारू आस्ट्रेलिया में पाया जानेवाला एक स्तनधारी पशु है। यह आस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पशु भी है। यह जानवर सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। कंगारू भारत में नहीं पाए जाते हैं। सिर्फ कुछ चिड़ियाघरों में कंगारू हैं।

2011 में पहली बार चिड़ियाघर में लाए गए थे कंगारू

जून 2011 में, कोलकाता के अलीपुर चिड़ियाघर ने चेक गणराज्य से दो जोड़े लाल कंगारू लाए गए लेकिन उन सभी की मृत्यु हो गई। आखिरी लाल कंगारू की मौत अक्टूबर 2015 में हुई थी। उसके बाद, कोलकाता के चिड़ियाघर को 2016 में योकोहामा चिड़ियाघर से चार पूर्वी ग्रे कंगारू मिले।

पहली बार 1773 में सामने आया अस्तित्व

कंगारू शाकाहारी, मारसूपियल (marsupial) जीव हैं जो स्तनधारियों में अपने ढंग के निराले प्राणी हैं। इन्हें सन्‌ 1773 ई. में कैप्टन कुक ने देखा और तभी ये पहली बार लोगों के सामने आए।

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