अपनी जान पर खेल कर आग की लपटों में कूद गया पुलिस कांस्टेबल, ढाई साल की बच्ची समेत बचाई 3 महिलायों की जान

दोस्तों सभी रोजाना की तरह अपने कामो के लिए निकले हो कुछ मार्किट गये और तभी वंहा अचानक कुछ ऐसा माहौल बन जाए जिसकी आपने कल्पना भी नही की हो आपकी आँखों के सामने आसपास की सभी चीज़े आग्नि में जलकर स्वाहा हो जाए . वो खौफनाक मंजर देखकर कर ही रूह काँप जाए . आज हम आपको ऐसे ही एक मामले के बारे में बताने वाले है दरअसल करौली में शनिवार को नव संवत्सर पर बाइक रैली निकली जा रही थी . जिस दौरान लाख की दुकानों में आग लगाई गयी जो कुछ समय में ही मकानों तक पहुंच गई .जबकि एक घर इस आग की लपटों में बुरी तरह जल गया .

उसमें मासूम बच्ची पीहू के साथ उसकी मां विनिता अग्रवाल, चाची वैशाली अग्रवाल व मामी बबीता फंसे हुए थे. चारों तरफ भगदड़ पथराव और आग की लपटें उठ रही थीं. जिसके वे साक्षात गवाह बने सब देख रहे थे. इस बीच आग की लपटें और धुंए के गुबार में ढ़ाई वर्षीय मासूम का दम घुटने लगा और और विनिता अपनी बेटी और अपनी जिंदगी जीने की उम्मीद भी खो चुकी थी.

तब एक पुलिस कांस्टेबल नेत्रेश ने अपनी जान की परवाह किए बिना ही अपनी जान हथेली पर रखकर उस आग की लपटों में कूद गया और ढाई वर्षीय बच्ची, उसकी मां तथा अन्य दो महिलाओं को घर से बाहार निकाला. एसपी शैलेन्द्र सिंह इंदोलिया ने उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर भिजवाया और उनके परिजनों को उन्हें सुरक्षित सुपूर्द कराया. पुलिस जवान के इस कारनामें ने पुलिस की एक स्वच्छ और मददगार छवि की मिशाल पेश की और करौली पुलिस का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया. जिसके फलस्वरूप मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पुलिस जवान के कारनामे पर नेत्रेश की दूरभाष पर प्रशंसा करते हुए उसके कांस्टेबल से हैडकांस्टेबल पर पदोन्नति के लिए बंधाई दी.

करौली निवासी विनिता अग्रवाल ने बताया कि उसकी देवरानी का गणगौर पर सिजारा जाना था तो वह अपनी बच्ची पीहू, देवरानी वैशाली व देवरानी की भाभी बबीता के साथ बाजार चली गईं. उसने बताया कि साढ़े तीन बजे हम घर से गए और पहले साड़ी व अन्य सामान खरीदा. फिर हम फूटाकोट चौराहे पर चूड़ा खरीदने गए और वहां पर चूड़ा देखने लगे. तभी दुकानदार बोला कि रैली आ रही है और यह कहकर दुकान से हमें बाहार निकाल दिया और शटर लगा दी. एकाएक सभी दुकानें बंद हो गईं. थोड़ी देर बाद ही हमने माहौल को बिगड़ता देखा तो हम पास ही स्थित एक घर के अंदर जा रहे लोगों के साथ उस घर के अंदर चले गए. थोड़ी देर बाद दुकान की शटरों पर पत्थर फेंकने की आवाज आईं और लगभग 15 मिनट बाद आग की लपटे दिखाई देने लगी. धीरे-धीरे तीनों ओर से आग की लपटें उठने लगीं.

सभी जगह धुंए के गुबार उठने लगे और धुंए से घर के अंदर दम घुटने लगा. वहां पर मौजूद अन्य लोग घर के ऊपर छत पर जाने लगे, लेकिन मेरी बेटी सो रही थी और मैं उसे लेकर कही भी नहीं जाना चाहती थी. मेरी बेटी मेरे लिए बहुत जरूरी थी. हम ऐसी स्थिति में डर गए और मैंने रोते हुए अपने पति हरिओम को फोन किया तो वह भी चिंता में पड़ गए और कहा कि मैं जल्द वहां आ रहा हूं. मेरे पति ने मुझसे लोकेशन मांगी तो मैंने कह दिया कि मैं फूटाकोट पर हूं, लेकिन लोकेशन नहीं भेजी क्यूंकि मैं अपने पति को खतरे में नहीं डालना चाहती थी. तभी नीचे से माइक से आवाज आई कि कोई भी घरों में हो तो बाहार आ जाए, घबराए नहीं, सभी जगह पुलिस तैनात है, डरने की जरुरत नहीं है.

किसी ने कहां कि पुलिस आ गई है तो हमारी जान में जान आई. तभी घर के मालिक ने घर का गेट खोला और हमने देखा कि एक सफेद कलर की गाड़ी जिसपर पुलिस अधीक्षक लिखा हुआ था उसके पास पुलिस की वर्दी पहने हाथ में डंडा लिए एक व्यक्ति माइक पर एनाउसमेंट कर रहा था और कुछ पुलिस के लोग घरों में फंसे लोगों को निकाल रहे थे तो कोई पुलिसकर्मी आग बुझा रहा था. सभी जगह आग की लपटें उठ रहीं थी, सड़क पर चूड़े फैले थे और उनमें आग लग रही थी. तभी घर के मालिक (जिस घर में हम फंसे थे) ने पुलिस को आवाज लगाई और माइक पर एनाउसमेंट कर रहे पुलिसकर्मी जो कि स्वयं एसपी शैलेन्द्र सिंह इन्दोलिया थे उन्होंने आगे बढ़कर दो पुलिस जवानों को निर्देश दिया तो एक पुलिसकर्मी पहले मेरी देवरानी और उसकी भाभी को बाहार निकाल कर ले गए और पुलिसकर्मी नेत्रेश कुमार मेरी कपड़े में लिपटी बेटी को गोदी में लेकर मुझे पीछे आने की कहकर वहां से निकाल कर लए.

बेटी को लगभग आग वाले स्थान से 20 मीटर दूर ले जाकर उतारा तो मेरी बेटी मेरे गले से लिपट गई और मेरी आंखों से आंसू आ गए. थोड़ी देर बाद पुलिस ने हमें सुरक्षित स्थान पर बैठाया और मेरे पति हरिओम के आने पर हमे सुरक्षित उनके साथ भेज दिया. विनिता ने कहा कि जब तक पुलिस में ऐसे अधिकारी और जांबाज सिपाही हैं तब तक हम सुरक्षित हैं. मैं ऐसे लोगों को अपनी, अपनी बेटी और अपने परिजनों की ओर से हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं.

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