मुग़ल बादशाह था उस रानी का ग़ुलाम,असली बादशाह थी ये रानी

दोस्तो पुराने समय में देश पर बहुत से शूरवीर राजा महाराजाओं और सम्राटो का शासनकाल रहा है । पूरे देश पर हकुम्त करना हर शहंशा का सपना होता है ।जिसके लिए उसे न जाने कितने युद्ध लड़ने पड़ते है कितने बलिदान देने पड़ते है उसके बाद भी एक शहंशा को टूटने या कमजोर पड़ने का अधिकार नही होता । हर परिस्थिति में उसे मजबूत बने रहना पड़ता है ।लेकिन आज हम आपको एक ऐसे सम्राट के बारे में बताने वाले है जो एक मुगल रानी के सामने अपनी सारी ताकत हार कर कमजोर पड़ गया था । उस सम्राट और मुगल रानी के बारे में जानने के लिए लेख को अंत तक जरूर पढ़े।

मुगल काल की वो रानी जिसने ताकतवर सम्राट को कमजोर बनाकर एक दशक तक सारे फैसले खुद लिए

यूं तो जहांगीर का मतलब है पूरी दुनिया को जीतने वाला, लेकिन बेगम के प्रति प्रेम ने उसे कमजोर कर दिया था. वो भी इतना कि दरबार दो हिस्सों में बंट गया था.मिर्जा गयासबेग अकबर और जहांगीर के दौर में अहम स्थान रखते थे. उनकी काबिलियत को देखते हुए मुगल सामाज्य में कई पदोन्नति दी गईं. उसे शाही कारखाने की अहम जिम्मेदारी देने के साथ एतमाद-उद-दौला की पदवी से सम्मानित भी किया गया. मिर्जा गयासबेग अपनी बेटी मेहरून्निसा की शिक्षा को लेकर काफी सचेत था. कहा जाता है कि मेहरून्निसा सौन्दर्य के साथ तेज दिमाग की धनी थी. उसकी खूबसरती पर अकबर के बेटा जहांगीर मर मिटा था. वह शादी करना चाहता था, लेकिन अकबर को यह नामंजूर था. इसलिए मुग़ल सल्तनत  के बादशाह अकबर ने मेहरून्निसा की शादी 1594 में एक एक व्यापारी अलीकुली खां से करा दी.

अलीकुली खां मुगल साम्राज्य के लिए काम करता था. एक दिन उसने शेर का शिकार किया. इस बात से खुश होकर जहांगीर ने उसे शेर अफगान की उपाधि दी, लेकिन जब शहजादे सलीम यानी जहांगीर ने अकबर से व्रिदोह किया तो अलीकुली खां को यह बात पसंद न आई और वो शहजादे का साथ छोड़कर अकबर के पास आया और विश्वासपात्र बन गया.

वो दौर जब इतिहास करवट ले रहा था

यह वो दौर था जब मुगल साम्राज्य का इतिहास करवट ले रहा था. अलीकुली खां राजमहल में पेश होने का आदेश जारी किया गया. लेकिन अलीकुली खां देरी से पहुंचा तो जहांगीर के करीबी कुतुबउद्दीन ने सजा के तौर पर उसे कैद करने की कोशिश की. कुछ समय चली जद्दोजहद के बाद आखिरकार शेर अफगान की मौत हो गई.

अलीकुली खां की मौत के बाद उसकी पत्नी मेहरून्निसा और उसकी बेटी को सुरक्षापर्वूक राजमहल लाया गया. यहां मेहरून्निसा को राजमाता रुकैया सुल्तान बेगल की देखरेख में लगा दिया गया. जहांगीर ने एक लम्बे समय के बाद 1611 में नौरोज के मौके पर मीनाबाजार में मेहरून्निसा को दोबारा देखा. इस बार वो इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि विवाह कर लिया. विवाह के बाद मेहरून्निसा को नूरजहां बेगम की पदवी दे दी.

हालांकि दोनों की शादी को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत रहे हैं. जैसे- डच लेखक डी लेट का कहना है, जहांगीर मेहरून्निसा से उसी समय से प्रेम करने लगा था उसकी शादी नहीं हुई थी, अकबर के विरोध के कारण दोनों की शादी नहीं हो पाई थी. हालांकि उसने प्रेम करना नहीं छोड़ा.

वहीं, इतिहासकार डॉ. बेनी प्रसाद इस बात को नहीं मानते. उनका मानना है कि समकालीन इतिहासकारों ने कभी इस बात का जिक्र नहीं किया कि अकबर को शादी से ऐतराज था या अलीकुली की मौत के लिए जहांगीर जिम्मेदार था. अकबर के ऐसा करने की कोई बड़ी वजह नहीं थी. अगर अकबर ने ऐसा किया होता तो उसके पति को साम्राज्य में नौकरी ही नहीं देता.

नूरजहां का राजनीतिक सफर

1611 में जब नूरजहां की शादी जहांगीर से हुई तब उनकी उम्र 43 साल भी. जहांगीर इस कदर बेगम के प्यार में पागल थे कि शासन करने और बादशाह के चिन्ह धारण करने का अधिकार तक नूरजहां को दे दिया था. जैसे-जैसे जहांगीर की विलासिता बढ़ती गई, वैसे-वैसे नूरजहां के रुबते में बढ़ोतरी होती गई. इतना ही नहीं, नूरजहां के भाई आशफ खां को खाने सामां का पद दिया गया. नूरजहां ने आशफ खां की बेटी की शादी जहांगीर के तीसरे बेटे खुर्रम से हुई. इस तरह नूरजहां की ताकत में इजाफा हुआ. एक गुट नूरजहां मंडली नाम का बन गया.

नूरजहां का प्रभाव ऐसा बढ़ा कि दरबार दो हिस्सों में बंट गया. पहला नूरजहां समर्थक और दूसरा जहांगीर समर्थक. दरबार के महावत खां ने जहांगीर से कहा कि वो दरबार को नूरजहां की मंडली के प्रभाव से मुक्त करें. जहांगीर ने महावत खां की बात का सम्मान किया, लेकिन ऐसा करना उनकी शान के खिलाफ था. लिहाजा महावत खां दुखी हुआ.

नतीजा, 1616 में जहांगीर के बेटे खुर्रम को आसफ खां के नियंत्रण में ला दिया. ऐसा होने के बाद शहजादे खुसरो को खुर्रम के नियंत्रण में रखा और 1622 में षडयंत्र करके उसकी हत्या करवा दी. नूरजहां ने अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए खुसरो की हत्या के बाद जहांगीर के अन्य दोनों बेटों खुर्रम और शहरयार पर नियंत्रण बनाए रखा. सत्ता में बने रहने के लिए नूरजहां ने पहले खुर्रम को उत्तराधिकार से वंचित किया. इसके बाद में जहांगीर के सबसे छोटे और प्रतिभाहीन पुत्र शहरयार को षडयंत्र का हिस्सा बनाया. अपने पहले पति शेर अफगान से हुई बेटी लाडली बेगम की शादी शहरयार से करा दी. इस तरह नूरजहां शहरयार को अपने साथ लेकर उसका इस्तेमाल खुर्रम के विरुद्ध करने लगीं. धीरे-धीरे खुर्रम का विद्रोह बढ़ने लगा. इस बीच पहले पिता और फिर मां की मौत के बाद एक-एक करके नूरजहां का गुट खत्म होने लगा. 1622 में नूरजहां के शासन का अंत हो गया.

 

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