फिल्म बनते ही उठे इतिहास पर सवाल,जानिए क्या है”सम्राट पृथ्वीराज की असली कहानी”

दोस्तों जैसा कि आपको मालूम है कि चाणक्य धारावाहिक से नाम कमाने वाले डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की फिल्म सम्राट पृथ्वीराज रिलीज हो चुकी है . इसी के साथ अभिनेता अक्षय कुमार और मानुषी झिल्लर की फिल्म को आठ देशो में बैन भी कर दिया गया है . जंहा इस फिल्म को देखने के लिए दर्शको की भीड़ उमड़ रही है वही इस फिल्म के आने के बाद इतिहास पर उठ रहे है हजारो सवाल .

बता दे पृथ्वीराज चौहान को देश के महान सम्राटो में से एक माना जाता है .कहा जा रहा है कि सम्राट पृथ्वीराज के बारे में भी देश के ज्यादातर लोगो को ठीक से जानकारी नही है .उनके बारे में बहुत कम प्रचार किया गया है .स्कूल ,कालेजो के पाठ्यक्रमो से लेकर हायर एज्युकेशन में पृथ्वीराज समेत कई हिन्दुस्तानी सम्राटो और यौधाओ को मुगलों और आक्रमणकारियों की अपेक्षा कम वैल्यू दी गयी .

क्या चल रहा है विवाद

इस फिल्म की रिलीज से पहले ही एक विवाद चला आ रहा है आपत्ति यह जताई जा रही है कि पृथ्वीराज चौहान के साथ इतिहास लिखने वालो ने न्याय नहीं किया .पुराने इतिहासकारों को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है .उन्होंने इतिहास लिखने में ईमानदारी नही बरती और आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी से युद्ध करने वाले सम्राट पृथ्वीराज को भारतीय इतिहास की किताबो में हारे हुए राजा की तरह पेश किया है .

देश भर के विभिन्न राज्यों में सरस्वती शिशु /विद्या मन्दिर नाम से स्कूल चलाने वाली संस्था विद्या भारती से जुड़े एक शिक्षाविद ने बातचीत के दौरान कहा कि सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बारे में लोगो को जितना जानना चाहिए .उसका पांच फीसदी भी नही जानते .उन्होंने बताया कि विद्या भारती ने चौथी कक्षा के इतिहास की किताब में ही सम्राट पृथ्वीराज चौहान ,राजा विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरो को जगह दी है .हालाँकि हायर एज्युकेशन में भी ऐसे शूरवीरो का इतिहास ढंग से शामिल करने की जरूरत है .

TV 9 की ट्वीटर स्पेस चर्चा में भी उठे सवाल

TV 9 डिजिटल के ख़ास कार्यक्रम ट्वीटर स्पेस में भी यह गुरूवार को चर्चा का विषय रहा जिसमे बुद्धिजीवियो,लेखक, पत्रकारों और इतिहासकारों ने मत रखा है कि इतिहास शासको के हिसाब से लिखा जाता रहा है . कई लोग इस बात पर एक मत थे कि देश पर जिन्होंने राज किया . चाहे वो मुग़ल हो या ब्रिटिश …उन्होंने अपने हिसाब से इतिहास लिखवाया .इस कार्यक्रम में यह बात भी उठी कि इतिहास को साइंटिफिक तरीके से और ऑथेन्टिक रेफरेंस के साथ लिखे जाने की जरूरत है .

कहा जा रहा है कि NCERT की किताबो में भी भारतीय नायको की विजयगाथा कम लिखी गयी है .कई कहानियो को गुप्त रखा गया है .जबकि भारत विरोधी आक्रमण कारियों को एक एक नायक के तौर पर पेश किया गया है .पिछले साल पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर नाम के एक थिंक टैंक ने NCERT की इतिहास की किताबो का विश्लेष्ण किया था और अपनी रिपोर्ट में बताया था कि इन किताबो में हिन्दू शासको मुस्लिम शासको के बराबर महत्व नही दिया गया है .बरहाल हम पृथ्वीराज की असली कहानी आपको बताते है .

पृथ्वीराज चौहान का जन्म और बचपन

पृथ्वीराज चौहान के जन्म को लेकर इतिहासकारों के अलग अलग मत है .पृथ्वीराज महाकाव्य में उनका जन्म 1 जून 1163 को गुजरात राज्य के पाटन पतंग नामक गाँव में बताया गया है . जबकि कुछ इतिहासकारों ने उनका जन्म 1166 तो कुछ ने 1168 में बताया है .अजमेर के राजा सोमेश्वर चौहान और कर्पूदेवी के बेटे पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही प्रतिभाशाली थे . चौहान परिवार में उस समय छ: भाषाए बोली जाती थी . संस्कृत ,प्राकृत,मागधी ,पैशाचिक ,शोर और अपभ्रंश कहा जाता है कि पृथ्वीराज की पकड़ इन सभी भाषाओ पर थी .

पृथ्वीराज ने परम्परागत शिक्षा लेने के आलावा वेदांत ,पुराण ,इतिहास ,सैन्य विज्ञान ,मिमासा और चिकित्सा की पढाई भी की थी .वे संगीत और चित्रकला में भी पारंगत थे . एक और बड़ी खासियत उनमे यह थी कि वे प्रभु राम के पिता दशरथ की तरह शब्दभेदी वाण चलाना जानते थे .यानि आवाज सुनकर निशाना लगाने में वे निपुण थे .

कम उम्र में सम्भाली गद्दी फिर बने दिल्ली के शासक

पृथ्वीराज जब 13 साल के थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गयी .फिर उन्हें अजमेर के सिंहासन पर बिठाया गया .उनके दादा अंग्म्म दिल्ली के शासक हुआ करते थे .पृथ्वीराज की वीरता और बहादुरी और वीरता के आधार पर दादा अंगम्म ने उन्हें दिल्ली के राज सिंहासन के उतराधिकारी घोषित कर दिया .दिल्ली की गद्दी सम्भालने के बाद चौहान ने किला रॉय पिथौरा बनवाया .कम उम्र में उन्होने गुजरात के शासक भीम देव को भी हरा दिया था कुछ इतिहासकारों के मुताबिक चौहान के पास विशाल सेना थी .जिसमे 300 हाथी और 3 लाख घुड़सवार और पैदल सैनिक शामिल थे .

पृथ्वीराज की प्रेम कहानी

पृथ्वीराज की प्रेम कहानी में राजा जयचंद की बेटी संयोगिता का जिक्र आता है .उनके मित्र चन्द् बरदाई रचित पुस्तक पृथ्वीराज रासो के मुताबिक पहली बार ग्यारह वर्ष की उम्र में ही पृथ्वीराज की शादी करा दी गयी थी . फिर 22 साल कई उम्र होने तक उनकी कई शादिया हुयी. पृथ्वीराज रासो में उनकी पांच रानियों का ही जिक्र है .ज्म्बावती ,इन्छ्नी यादवी ,शशिव्रता ,हंसावती और संयोगिता .

संयोगिता कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी थी .वाही जयचंद जिसकी गद्दारी की वजह से पृथ्वीराज को हार का मुंह देखना पडा .हलाकि पृथ्वीराज रासो के आलावा इतिहास में इसकी ठीक ठीक जानकारी नही है कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता और पृथ्वीराज एक दुसरे को पसंद करते थे . जयचंद ने संयोगिता का स्वयंवर रचाया था लेकिन पृथ्वीराज चौहान को पसंद नही करने के कारण द्वेषवश उनकी एक प्रतिमा द्वारपाल के रूप में लगा दी .पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता को स्वयंवर से ही उठा लिया .और दोनो ने गंधर्व विवाह किया .बाद में जयचंद भी समझ गया कि उनकी बेटी भी पृथ्वीराज को पसंद करती है .

पृथ्वीराज चौहान की वीरगाथा

पृथ्वीराज चौहान ने 1186 से 1191 के दौरान मोहम्मद गौरी को कई बार धुल चटाई है .हलाकि कितनी बार हराया है इस बारे में अलग अलग जानकारी दी गयी है . NBT गोल्ड पर अपने एक ब्लॉग पर गंगाधर ढोबले लिखते है कि हम्मीर महाकाव्य के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को सात बार हराया है .पृथ्वीराज प्रबंध के अनुसार आठ बार पृथ्वीराज रासो के अनुसार 21 बार जबकि प्रबंध चिंतामणि के अनुसार 23 बार हराया . कुछ मुस्लिम स्तोत्र केवल 2 लड़ाइयो ,तराइन के पहले और दुसरे युद्ध का जिक्र करते है .1191 में तराइन के पहले युद्ध में मोहम्मद गौरी को मुंह की खानी पड़ी .कहा जाता है कि एक सिपाही ने उसे अधमरी हालत में घोड़े पर चढ़ाकर मैदान छोड़ भागा था . उसकी सेना भी वापिस भागने लगी .हलाकि पृथ्वीराज ने फिर पीछा नही किया . हलाकि कहा जाता है पृथ्वीराज ने गौरी को 17 बार बंदी बनाकर छोड़ दिया .वही प्रबंध कोष में 20 बार जिक्र हुआ है .

शब्दभेदी बाण से मोहम्मद गौरी को मार डाला

1191 के बाद किसी ने कल्पना नही की थी कि इतनी बुरी हार के एक साल बाद ही मोहम्मद गौरी लौट आएगा .लेकिन 1192 में मोहम्मद गौरी लौट आया .इस बार जयचंद ने गद्दारी दिखाई और गौरी से जा मिला .18वी बार हुए इस युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान ने मात दिया और उन्हें और उनके मित्र चंदबरदाई बंदी बनाकर अपने साथ ले गया और सजा के तौर पर गर्म सलाखों से पृथ्वीराज की आँखे फोड़ दी .लेकिन पृथ्वीराज ने हिम्मत नही हारी .मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण चलाने वाली कला के बारे में पता चला और आखिरी इच्छा के रूप में चंदबरदाई के कहने पर इसके प्रदर्शन की इजाजत दे दी.

यही पर चार बांस ,चौबीस गज ,अंगुल अष्ट प्रमाण …ता ऊपर सुलतान है ,”मत चुको चौहान ” का जिक्र आता है .पृथ्वीराज चौहान के लिए मोहम्मद गौरी की दुरी मापने के लिए चंदबरदाई का यह संकेत काफी था . मोहम्मद गोरी ने जैसे ही शाबाश बोला ,आवाज सुनकर पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण चला डाला और मोहम्मद गोरी की मृत्यु हो गयी .लेकिन इसको लेकर भी इतिहासकारों में मततान्त्र है .

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