पितृ पक्ष में 16 साल बाद बना ऐसा संयोंग,भूलकर भी ना करें ये गलतियां नहीं तो पितृ हो जायंगे नाराज़

दोस्तों हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष का महत्त्व सबसे अधिक होता है पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष के रूप में भी जाना जाता है इसमें पूर्वजो को श्राद्ध और तर्पण किया जाता है इस पक्ष में विधि- विधान से पितर संबंधित कार्य करने से पितरों का आर्शावाद प्राप्त होता है। और हर साल की तरह इस साल भी पितृ पक्ष की शुरूआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से होता है धार्मिक मान्यताओं के अनुसार  इस दिन सभी लोग पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करके श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए यह न केवल पितरों को मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है बल्कि उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए भी किया जाता है। और कुछ ऐसे भी कार्य होते है है जो हमे पितृ पक्ष में भूलकर भी नही करने चाहिए इसके बारे  में विस्तार से जानने के लिए बने रहे लेख के अंत तक.

इस बार 10 सितंबर से पितृ तर्पण श्राद्ध पक्ष शुरू होने जा रहे हैं। इस बार श्राद्ध पक्ष 10 सितंबर से आरंभ होकर 25 सितंबर तक रहेंगे। ज्योतिषियों का कहना है कि इस साल श्राद्ध पक्ष 15 दिन की बजाए 16 दिन के रहने वाले हैं। पितृपक्ष में ऐसा संयोग 16 साल बाद आया है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान हमारे पितृ पृथ्वी लोक पर अपने सगे, संबंधी लोगों से अपनी आत्मा की मुक्ति और भोजन लेने के लिए मिलने आते हैं। श्राद्ध पक्ष के दौरान अगर श्राद्ध किया जाए तो पितरों की आत्मा तृप्त होती है और अपना शुभाशीष देते हैं। इसी कारण हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है।

शारदीय नवरात्र 26 सितंबर से :-

इस साल पितृ पक्ष 10 सितंबर से आरंभ होकर 25 सितंबर तक रहंगे। पितृ पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से शुरू होते हैं और आश्विन मास की अमावस्या को समाप्त होते हैं। यहीं नहीं पितृपक्ष के अगले दिन से नवरात्रि शुरु हो जाएगी। पितृ पक्ष समापन के अगले दिन से ही शारदीय नवरात्र की शुरुआत होगी। इस साल शारदीय नवरात्र 26 सितंबर से प्रारंभ हो रहे हैं।

कुछ समय के लिए टल जाते हैं शुभ कार्य :-

पितृ पक्ष के दौरान कुछ समय के लिए शुभ कार्यों को टाला जाता है। पितृ पक्ष में पितरों से निमित्त पिंडदान की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में श्राद्ध न करने से पितरों की आत्मा तृप्त नहीं होती है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या यानी सोलह दिनों को पितृ पक्ष कहा जाता है। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उस तिथि को पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है।

ऐसा संयोग 16 साल बाद आया :-

जयंती देवी मंदिर जींद के पुजारी नवीन शास्त्री ने बताया कि इस साल श्राद्ध पक्ष 15 दिन की बजाए 16 दिन के रहने वाले हैं। पितृपक्ष में ऐसा संयोग 16 साल बाद आया है। पितृ पक्ष में पिंडदान व श्राद्ध कर्म हेतु भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि भगवान विष्णु की पूजा करने से प्रेत से पितृ योनी में जाने का रास्ता खुल जाता है। साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि कौए, पितृ का रूप होते हैं। श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितृ कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वे रुष्ट हो जाते हैं।

क्या है पितृ पक्ष का महत्व :-

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिए। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इसके पीछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाए तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्यु लोक में भटकती रहती है।

किस दिन करें पूर्वजों का श्राद्ध :-

वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिए पिंड दान या श्राद्ध कर्म किए जा सकते हैं लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वजों का श्राद्ध करें इसके लिए शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिए। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है, इसलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।

क्रोध, चिड़चिड़ापन व कलह से दूर रहना चाहिए :-

पितृपक्ष के दौरान ब्राह्मण, भांजा, गुरु व नाती को भोजना कराना शुभ माना गया है। श्राद्ध के दिन क्रोध, चिड़चिड़ापन व कलह से दूर रहना चाहिए। पितृपक्ष में हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए। श्राद्धपक्ष में सही तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। यही उचित भी है। पिंडदान करने के लिए सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। हिदू धर्म अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने हिस्से का भाग किसी ना किसी रूप में ग्रहण करते हैं। सभी पितर इस समय अपने वंशजों के द्वार पर आकर अपने हिस्से का भोजन सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं। भोजन में जो भी खिलाया जाता है, वह पितरों तक पहुंच ही जाता है। अपने स्वर्गवासी पूर्वजों की शांति एवं मोक्ष के लिए किया जाने वाला दान एवं कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। जिसने हमें जीवन दिया उसके लिए, जिसने हमें जीवन देने वाले को जीवन दिया, उसके लिए तथा जो हमारे कुल एवं वंश का है। इस प्रकार तीन पीढ़ियों तक के लिए किया जाने वाला यज्ञ, पिंडदान तथा तर्पण ही श्राद्धकर्म कहलाता है।

पितरों को मिलती है शांति :-

विधि-विधान से जो कर्म तिल, जौ, कुशा व मंत्रों द्वारा श्रद्धापूर्वक किया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है। धार्मिक मान्यता अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितरों के नाम पर तर्पण व पिंडदान देने से पितरों को शांति मिलती है और वह जातक को सुखी रहने का आशीर्वाद देते हैं। इस दिन ब्राह्मण व पंडितों को श्रद्धापूर्वक भोजन, मिष्ठान्न, वस्त्रादि का दान दक्षिणा सहित देना चाहिए।

किस दिन किसका श्राद्ध करें :-

प्रतिपदा : इस तिथि को नाना-नानी का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।

पंचमी : जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।

नवमी : सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

एकादशी व द्वादशी : एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।

चतुर्दशी : इस तिथि में शस्त्र, आत्महत्या, विष और दुर्घटना यानी जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है। जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है।

सर्वपितृमोक्ष अमावस्या : पितृपक्ष की तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है।

इस बार श्राद्ध की तिथियां

10 सितंबर -पूर्णिमा का श्राद्ध एवं तर्पण

11 सितंबर -प्रतिपदा का श्राद्ध एवं तपर्ण

12 सितंबर -द्वितीया का श्राद्ध एवं तर्पण

13 सितंबर -तृतीया का श्राद्ध एवं तर्पण

14 सितंबर -चतुर्थी का श्राद्ध एवं तर्पण

15 सितंबर -पंचमी का श्राद्ध एवं तर्पण

16 सितंबर -षष्ठी का श्राद्ध एवं तर्पण

17 सितंबर -सप्तमी का श्राद्ध एवं तर्पण

18 सितंबर -अष्टमी का श्राद्ध एवं तर्पण

19 सितंबर -नवमी का श्राद्ध एवं तर्पण

20 सितंबर -दशमी का श्राद्ध एवं तर्पण

21 सितंबर -एकादशी का श्राद्ध तर्पण

22 सितंबर -द्वादशी का श्राद्ध एवं तर्पण

23 सितंबर -त्रयोदशी का श्राद्ध एवं तर्पण

24 सितंबर -चतुर्दशी का श्राद्ध एवं तर्पण

25 सितंबर अमावस्या का श्राद्ध एवं तर्पण

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